संतो की सार बातें






  1. अमूल्य और क्षणिक समझकर उत्तम से उत्तम काम में व्यतीत करना चाहिए। ऊक क्षण भी व्यर्थ नहीं बिताना चाहिए।
  2. यदि किसी कारणवश कभी कोई क्षण भगवत् चिंतन के बिना बीत जाये तो उसके लिए पुत्रशोक से भी बढ़कर घोर पश्र्चात्ताप करना चाहिए, जिससे फिर कभी ऐसी भूल न हो।
  3. जिसका समय व्यर्थ व्यय होता है, उसने समय का मूल्य समझा ही नहीं।
  4. यदि कोई हमारा दोष सिद्ध करें तो उसके लिये जहाँतक हो, सफाई नहीं देनी चाहिए; क्योंकि सफाई देने से दोषोंकी जड़ जमती है तथा दोष बतलानेवाले के चित्त में भविष्य के लिये रुकावट होती है। इससे हम निर्दोष नहीं हो पाते।
  5. यदि कहीं किन्हीं से काम लेना हो तो उनको अपने पास न बुलाकर उन्हीं के पास जाना चाहिये।
  6. सादगी से रहना चाहिए।
  7. स्वावलंबी बनना चाहिए।
  8. अपने ऊपर भगवान की दया और प्रेम समझकर हर समय प्रसन्न रहना चाहिए।
  9. सब प्राणियों पर हेतुरहीत दया और प्रेम करना चाहिए।
  10. एकान्त में मनको सदा यही समझाना चाहिये कि परमात्मा के सिवा किसी का चिंतन न करो; क्योंकि व्यर्थ चिंतन से बहुत हानि है।
  11. जहाँ व्याख्यानदाता बहुत हों, वहाँ जहाँतक हो व्याख्यान न दे।
  12. पूजा-प्रतिष्ठा, ऊँचे आसान और ऊँचे पद से सदा ही दूर रहना चाहिए।
  13. जहाँतक हो, गुरु बनने की इच्छा कभी न करे।
  14. भगवान के नाम रूप को याद रखते हुए ही सामाजिक, व्यावहारिक, आर्थिक आदि कार्य न्यायपूर्वक नि:स्वार्थ भावसे करे; क्योंकि अपनी सारी चेष्टा निस्वार्थ भावसे दूसरे के हित के लिये करने से ही कल्याण होता है।
  15. कर्तव्य का पालन न होनेपर तथा अपने से बुरा काम बन जानेपर पश्र्चात्ताप करे, जिससे कि फिर कभी वैसा न हो।
  16. कर्तव्य कर्मको झंझट मान लेनेपर वह भाररूप हो जाता है, विशेष लाभदायक नहीं होता।
  17. उत्तम कामको सबसे पहले करने कि चेष्टा करे, क्योंकि शरीर का कोई भरोसा नहीं है।
  18. जिसमें प्राणियों की हिंसा होतीं हो, ऐसी किसी चीज को व्यवहार में न लावे।
  19. ईश्वर के ज्ञान के समान कोई ज्ञान नहीं।
  20. ईश्वर के प्रभाव के समान कोई प्रभाव नहीं।
  21. ईश्वर के दर्शन के समान कोई दर्शन नहीं।
  22. महापुरुषों के आचरण से बढ़कर कोई अनुकरणीय आचरण नहीं।
  23. परमात्मा की प्राप्ति के समान कोई लाभ नहीं।
  24. सत्संग के समान कोई मित्र नहीं।
  25. दया के समान कोई धर्म नहीं, हिंसा के समान कोई पाप नहीं, ध्यान के समान कोई साधन नहीं, शांति के समान कोई सुख नहीं, ज्ञान के समान कोई पवित्र नहीं, ईश्र्वर के समान कोई इष्ट नहीं।
  26. जिसने सत्य, अहिंसा, क्षमा, दया, समता, शांति, संतोष, सरलता, त्याग जैसे शस्त्र धारण कर रखे हैं, उसका कोई भी शत्रु किंचिन्मात्र भी अनिष्ट नहीं कर सकता।
  27. भगवान् की प्राप्ति के सिवा मनमें किसी भी बात की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।
  28. महात्मा के हृदय में किसी प्रकार की इच्छा रहती ही नहीं, हमें भी उसी प्रकार बनना चाहिए।
  29. महापुरुषों के प्रभाव से भगवान की प्राप्ति होना यह तो उनका अलौकिक प्रभाव है तथा सांसारिक कार्य की सिध्द्वि होना लौकिक प्रभाव है।
  30. सर्वस्व जाये तो भी कभी किसी निमित्त से कहीं किंचिन्मात्र भी पाप न करे, न करवाये और न उसमें सहमत ही हो।
  31. पैसे न्याय से ही कमाये, अन्याय से कभी नहीं, चाहे भूखों ही मरना पड़े।
  32. ईश्र्वर की भक्ति और धर्मको कभी छोड़े ही नहीं, प्राण भले ही चले जायँ।
  33. स्वार्थ का त्याग समान व्यवहार से श्रेष्ठ है, इसलिये नि:स्वार्थ भाव से सबकी सेवा करनी चाहिए।
  34. दूसरो को दु:ख पहुँचाने के समान कोई पाप नहीं है और सुख पहुँचाने के समान कोई धर्म नहीं है। इसलिये हर समय दूसरों के हित के लिये ही प्रयत्न करना चाहिए।
  35. किसीका उपकार करके उसपर अहसान न करे, न किसी से कहे और न मनमें अभिमान ही करे; नहीं तो किया हुआ उपकार क्षीण हो जाता है। ऐसा समझे कि सबकुछ भगवान् ही करवाते हैं, मैं तो निमित्तमात्र हूँ।
  36. अनिष्ट करनेवाले के साथ बदले में बुराई न करे, उसे क्षमा कर दे; क्योंकि प्रतिहिंसा का भाव रखने से मनुष्य दोष का भागी होता हैं।
  37. अपने द्वारा किसीका अनिष्ट हो जाय तो सदा उसका हित ही करता रहे, जिससे कि अपने किये हुए अपराध को वह मनसे भूल जाय, यही इसका असली प्रायश्चित हैं।
  38. मन और इन्द्रियों को इस प्रकार वशमें रखना चाहिए कि जिससे वे व्यर्थ और पापके काममें न जाकर जहाँ हम लगाना चाहें उसी भगवनप्राप्ति के मार्गपर लगी रहें।
  39. शरीर और संसार में जो आसक्ति है, वही सारे अनर्थो का मूल है, उसका सर्वथा त्याग करना चाहिए।
  40. कोई भी सांसारिक भोग खतरे से खाली नहीं है, इसलिये उससे दूर रहना चाहिए।
  41. कामिनी, मान, बड़ाई, ईष्याँ, आलस्य, प्रमाद, ऐश, आराम, भोग, दुर्गुण और पापको साधन में महान विघ्न समझकर इन सबका विषके तुल्य सर्वथा त्याग करना चाहिए।
  42. ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, सदगुण, सदाचार, सेवा और संयमको अमृत के समान समझकर सदा सर्वदा इनका सेवन करना चाहिए।
  43. शौचाचार से सदाचार बहुत ऊँचा है, उससे भी भगवान की भक्ति और भी उँचे दर्जेकी चीज हैं।
  44. भगवान् जाति-पाँति कुछ नहीं देखते, केवल प्रेम ही देखते हैं; अतः मनुष्यको केवल भगवान से ही प्रेम करना चाहिए।
  45. शीध्र कल्याण चाहनेवाले मनुष्य को परमात्मा की प्राप्ति के सिवा और किसी भी बात की इच्छा नहीं रखनी चाहिए; क्योंकि इसके सिवा सब इच्छाएँ जन्म-मृत्यु रूप संसार सागर में भ्रमानेवाली हैं।
  46. जिसने ईश्वर की दया और प्रेम के तत्व रहस्य को जान लिया है, उससे शांति और आनंद की सीमा नहीं रहती।
  47. जो अपने आपको ईश्वरके अर्पण कर चुका है और ईश्वर पर ही निर्भर है, उसकी सदा सर्वदा सब प्रकार से ईश्वर रक्षा करता है, इससे वह सदा के लिए निर्भय पदकों प्राप्त हो जाता हैं।

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