कबीरवाणी





पहले दाता शिष भया,
जिन तन मन अरपा शीश।
पाछे दाता गुरु भये,
जिन नाम दिया बख्शीश।।
प्रेम न बाड़ी ऊपजै,
प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रुचै,
शीश दिये ले जाय।।

फ़िक्र सभी को खा गया,

फ़िक्र सभी का पीर।
जो फ़िक्र की फांकी करे,
उसका नाम फकीर।।

चिंता सबको खा रही है। डर सबको सता रहा है। चिंता मनुष्य के जीवन में ऐसी बस गयीं है की उसको लगता है इसके बिना तो छुटकारा ही नहीं हैं। जो मनुष्य चिंता को छोडकर जीवन में आगे बढे वही फकीर जिसको जीवन जीना आ गया।




गुरु सम दाता जग में कोई नहीं।

सब जग मांगन हारा।।

सात द्वीप नव खंड में,

गुरु सबका करतारा।
क्या राजा क्या बादशाह जी,
सबने ही हाथ पसारा।।

गुरू के समान कोई दाता नहीं है। सारी दुनिया मांगने वाली हैं। पुराणानुसार यह विश्व सात महाद्वीपोंं व नौ खंडो का है। इस पर जितने भी लोग है उन सबके उनके कताॅ-धताॅ गुरु है। चाहे कोई राजा हो या महाराजा, ज्ञान की भीख पाने के लिए सभी को गुरु के आगे हाथ पसारना पड़ता है।


पाहन पूजे हरि ना मिलेंं,

सुन ले मूढ़ गंवारा।
अड़सठ रा फल एक है,
जो द्वारे सन्त पधारा।।

ऐ मुखॅ, पत्थर की पूजा करने से भगवान नहीं मिलते। दरवाज़े पर ही पहुंचने वाले जीते-जागते संतो का सत्कार करने का फल अड़सठ तीथॅ-भ्रमण के बराबर होता है।


कपटी तीरथ में गया वह,

कहां का तीरथ न्हाया।
कपट दाग दिल का नहीं धोया,
केवल अंग पखारा।।

यदि कोई कपट भरे मन से बाहरी 

र्तीर्थो का भ्रमण कर भी आये तो उसे लाभ नहीं होता। अपने मन से छल -कपट का दाग तो धोया नहीं, केवल शरीर की सफाई मेंं लगा रहा। जल में नहाने से शरीर का मैल भले ही धुल जाये, किंतु अंदर का मैल तो पूवॅवत रहता है।

कागज नाव बनाय के जी, 

बिच बिच लोहा जडि़या।
सतगुरू पार उतारसी यों,
चौड़े सन्त पुकारा।।

जैसे कागज की नाव में लोहे की कीलेंं जड़ कर किसी दरिया को पार करना असंभव है वैसे दान-पुण्य या तीथॅ -व्रत से भवसागर पार नहीं कर सकते उनके लिए तो समय के सदगुरु ही पार करा सकते है।


भव सागर गहरा घणां जी,

बहा जात संसारा।
कहे 'कबीर' तेहि पार उतारुँ,
जो कोई होय हमारा।।

इस संसार रुपी गहरे महासागर में सारे लोग बहे जा रहे है। कबीरदासजी कहते हैं कि जो पूणॅ रुप से हमारा हो जायेगा, उसे मैं निश्चय ही पार उतार दूंगा।




हमारे गुरु ने दीनी अमृत नाम जड़ी।।

काटे से कटत नाहीं,
जारे से जरत नाहीं,
निशदिन रहत हरी।।

हमारे गुरु ने हमें अमृत नाम रुपी जड़ी दी है। यह जड़ी न तो काटने से कटती है, न जलाने से जलती है। यह रात-दिन हरी रहती है।


यह तो जड़ी मोहे प्यारी लागे,

अमृत रस से भरी।।

यह जड़ी मुझे बहुत प्रिय लगती है, क्योंकि यह अमृत रस से सराबोर है।


काया नगर में अधर एक बंगला,

ता में गुप्त धरी।।

इस शरीर रुपी नगर के बीच अधर में ही हृदय रुपी एक बंगला बना हुआ है। उसी में यह नाम रुपी जड़ी छिपाकर रखी हुई है।


पांंच नाग,

पच्चीस नागिनी,
सूंघत तुरत मरी।।

इंद्रियों के पांच विषय रुपी नाग व उनकी पच्चीस वृत्ति रुपी नागिनें इस जड़ी को सूंघते ही खत्म हो जाते है।


इस काली ने सब जग खाया,

सतगुरु देख डरी।।

यह माया रुपी काली नागिन सारे संसार को अपना ग्रास बना रही है, लेकिन सतगुरु को देखकर यह भी डरती है।


कहें 'कबीर' सुनो भाई साधो,

काहू बिरले के हाथ परी।।

कबीरदासजी कहते है कि यह सतनाम रुपी जड़ी किसी बिरले व्यक्ति के हाथ ही लगती है, क्योंकि यह गुरु कृपा से प्राप्त होती।




आपे खेल खिलाड़ी सतगुरू,

आपे लीलाधारी है।।

आसमान का तम्बू बनाया,

ज़मीं गलीचा डारी है।
चन्द्र सूर्य दो मशाल बनाये,
तारों की फुलवारी है।।

हे सतगुरु, आप ही खेल और खिलाडी दोनों हैं। आप खुद ही अनेक लीलाएं करने वाले हैं। आपने ही यह आसमान रुपी शामियाना बनाया, जिसके नीचे जमीन रुपी गलीचा बिछा दिया। आपने सूर्य व चंद्रमा रुपी दो मशालें बना कर सितारों की फुलवारी लगा दी है।


हंस नाम की चौपड़ माँडी,

पासा हरि जग सारी है।
पासा चाहे तिसे जितावे,
सारी कौन बिचारी है।।

आपने ही 'प्रभु नाम' का चौसर बनाया है जिसमें खुद परमात्मा ही पासा है और मनुष्य गोटियां। पासा जिसे चाहे उसे जिता सकता है, बेचारी गोटियों की क्या बिसात है!


पंजा छक्का नर्द बचावे,

बाजी कठिन करारी है।
जिसकी नर्द पक्की घर आवे,
सोई सुघड़ खिलाड़ी है।।

पांच विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध और छह विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं डाह इनसे अपनी-अपनी गोटी को बचाना है और और यह बड़ी कठिन बाजी है। जिसकी गोटी पक्की होकर अपने घर आ जाती है, वही कुशल खिलाड़ी है।


श्रृंगी ऋषि बन में जा लुटे,

शंकर मारो मारी है।
बड़े बड़े हंकारी लुट गये,
रैयत कौन बिचारी है।।

जंगल में रहने वाले श्रृंगी ऋषि को भी माया ने नहीं छोड़ा, उन्हें जंगल में भी लूट लिया। यहां तक कि कामदेव को भस्म करनेवाले शंकर भी अपने को उससे बचा नहीं पाये। इस दुनिया में अपने धन, बल व विधा पर घमंड करनेवाले बडे-बडे अभिमानी भी माया के हाथों लूट लिये गये, तो फिर आम लोगों की क्या गिनती है!


जिनको बल सतगुरु पूरे का,

तिन का जगत भिखारी है।
कहत 'कबीर' सुनो भाई साधो,
अबके जीत हमारी है।।

वास्तव में जिनको पूणँ सदगुरु का बल है, उनके सामने तो सारी दुनिया भिखारी है। कबीरदासजी कहते हैं कि हे साधुओं, मैं पूणँ सजग हूं, और इस बार इस खेल में मेरी ही जीत होगी।




सतगुरु मिले म्हारे सब दुख बिसरे,

अन्तर के पट खुल गयो री।
ज्ञान की आग जगी घट भीतर,
कोटि कर्म सब जल गयो री।।

सतगुरु के मिलने के साथ ही मेरे सारे दुख दूर हो गये। अपने हृदय की दुनिया में प्रवेश करने का दरवाजा खुल गया। मेरे घट के अंदर ज्ञान की ऐसी अग्नि प्रज्वलित हुई कि करोड़ों कमोँ के बंधन जल कर राख हो गये।


पांच चोर लूटै थे रात दिन,

आप से आप ही टल गयो री।
बिन दीपक म्हारे भयो री उजारा,
तिमिर जाने कहां नस गयो री।।

काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार पांच विषय रूपी चोर रात दिन मुझे लूटा करते थे, अब इनका भय भी अपने आप दूर हो गया, क्योंकि मेरे घट के अंदर बिना दीपक के ही उजाला हो गया और अंधेरा न जाने कहां जाकर नष्ट हो गया!


त्रिवेणी से म्हारे धार बहत है,

अष्ट कमल दल खिल गयो री।
अड़सठ तीरथ है घट भीतर,
आपस में रल मिल गयो री।।

मेरे अंदर की दुनिया में गंगा, यमुना व सरस्वती नदियों जैसे ही इंगला, पिंगला व सुषुम्ना नाड़ियों की द्वारा बह रही है और आठ पंखुड़ियो वाला हृदय कमल गुरु की कृपा से खिल गया है। यह अनुभव साधकों को ज्ञान अभ्यास से ही प्राप्त होता है। घट के अंदर जो सारे अड़सठ तीर्थ हैंं, सदगुरु कृपा से उन सबका संगम हो गया, पवित्रता की चरम अनुभूति होने लगी।


सुन्न महल में नौबत बाजी,

अमी के कुंड उझल गयो री।
कहे 'कबीर' सुनो भाई साधो,
नूर में नूर जो मिल गयो री।।

हृदय के आकाश में बने अनोखे महल में अनहद के नगाड़े गूंज रहे हैं, और ज्ञान रुपी अमृत के कुंड अमृत उँडेल रहे है। कबीरदासजी कहते है कि सदगुरु कृपा से मेरे निजत्व की ज्योति परमात्मा की ज्योति से मिल गयी। मुझे मेरा सही ठिकाना मिल गया।




सतगुरु हैं रंगरेज,

चुनर मोरी रंग डारी।।

स्याही रंग छुड़ाय कै रे,

दियो मजीठा रंग।
धोय से छूटै नहीं रे,
दिन दिन होत सुरंग।।

मेरे सतगुरु रंगरेज हैं, उन्होंने अपने रंग में मेरी चुनरी रंग डाली। अज्ञान की कालिमा धोकर उन्होंने प्रेम का ऐसा गहरा लाल रंग चढ़ा दिया है जो धोने पर भी नहीं छूटता और दिन पर दिन अधिक गहराता जा रहा है।


भाव के कुंड,

नेह के जल में,
प्रेम रंग दई बोर।
चस की चास लगाय के रे,
खूब रंगी झकझोर।।

भाव रुपी कुंड में स्नेह का जल डालकर उन्होंने उसमें प्रेम का रंग मिला दिया, और भक्ति रुपी अभ्रक डालकर चुनरी को जब उसमें रंगा तो वह और भी चमकदार हो गयी।


सतगुरु ने चुनरी रंगी रे,

सतगुरु चतुर सुजान।
सब कुछ उन पर वार दूं रे,
तन मन धन अरु प्रान।।

उन चतुर और सुजान सदगुरु ने मेरे शरीर और हृदय की चुनरी बड़ी सुंदर रंग दी है। मैं अपने ज्ञानदाता की महानता का क्या बखान करुं, केवल उनके श्री चरणों में अपना तन, मन, धन और प्राण निछावर करता हूं।


कहे 'कबीर' रंगरेज गुरु रे,

मुझ पर हुए दयाल।
सीतल चुनरी ओढि़ कै रे,
भई हौं मगन निहाल।।

कबीरदासजी कहते हैं कि ऐसे रंगरेज गुरु मुझ पर अति दयालु हो गये हैं और उनके द्वारा रंगी इस चुनरी को ओढ़ कर मैं तो निहाल हो गया हूं, सफल मनोरथ हो गया हूं।



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