अगर है शौक मिलने का,
तो हरदम लौ लगाता जा।।
यदि रब से मिलने का शौक है, तो प्रत्येक पल रब से लौ लगाये रहो।
न रख रोज़ा न मर भूखा,
न जा मस्जिद न कर सिजदा।
वज़ू का तोड़ दे कूज़ा,
शराबे शौख पीता जा।।
यदि इस प्रकार लौ लग गयी तो फिर न रोज़ा रखने की जरूरत है और न बाहरी मस्जिद में जाकर सिजदा करने की और वज़ू आदि कर्मकांड करने की। बस, रब मिलन की चाहत की मदिरा पीते रहो।
पकड़ कर इश्क की झाड़ू,
सफा कर दिल के हुजरे को।
दुई की धूल रख सर से,
मुसल्ले पर उड़ाता जा।।
रब प्रेम रूपी झाड़ू से अपने हृदय की कोठरी को साफ करते रहो, और द्वेत भावना की धूल सिर से झाड़कर नमाज़ पढने के मुसल्ले पर उड़ा दो, यानी जब नमाज़ पढ़ो तो द्वेत भाव को त्याग दो।
पियाला मय खुदी का छोड़,
पियाला बे-खुदी का पी।
नशे में सैर कर प्यारे,
'तू ही तू' गीत गाता जा।।
अपने अहमभाव के शराब के प्याले को छोड़कर निज-समर्पण का रस पीओ। सच्चे प्रेम के नशे में मस्त होकर इस दुनिया की सैर करो। तुम्हारा हृदय यह धून गाता चले कि "हे परवरदिगार, तू ही सब कुछ है।"
यह धागा तोड़ दे तसबी,
किताबें डाल पानी में।
मशायख़ बन के क्या करना,
मशीख़त को जलाता जा।।
इस तसबीह का धागा तोड़ दो और ग्रंथो को पानी में डाल दो, यानी रब प्रेम के मार्ग में इनसे कोई भी मदद नहीं मिल सकती। अपने को शेखों की ऊँची जाति का न समझ कर इंसान बनो और इस अभिमान को त्याग दो।
खुदा को दूर मत समझो,
यही रस्ता है मस्तों का।
खुदी को दूर कर दिल से,
इसी के बीच आता जा।।
रब को अपने से दूर मत समझो। यही मस्तों का रास्ता है, जो अंतर्मुखी बनाता है। दिल से मेरेपन की भावना मिटाकर हृदय के बीच अपना मुकाम बनाओ।
कहे 'मंसूर' काज़ी से,
निवाला कुफ्र का मत खा।
अनलहक़ नाम बरह़क है,
यही कलमा सुनाता जा।
मंसूर फकीर काज़ी से कहते हैं कि "तू रब विमुखता का ग्रास मत खा।" अर्थात् रब से विमुख मत हो जाओ। 'मैं रब का ही अंश हूँ' यही संकल्प वाजिब है। इसी को लोगों को समझाओ।
पकड़ कर इश्क की झाड़ू,
सफा कर दिल के हुजरे को।
दुई की धूल रख सर से,
मुसल्ले पर उड़ाता जा।।
रब प्रेम रूपी झाड़ू से अपने हृदय की कोठरी को साफ करते रहो, और द्वेत भावना की धूल सिर से झाड़कर नमाज़ पढने के मुसल्ले पर उड़ा दो, यानी जब नमाज़ पढ़ो तो द्वेत भाव को त्याग दो।
पियाला मय खुदी का छोड़,
पियाला बे-खुदी का पी।
नशे में सैर कर प्यारे,
'तू ही तू' गीत गाता जा।।
अपने अहमभाव के शराब के प्याले को छोड़कर निज-समर्पण का रस पीओ। सच्चे प्रेम के नशे में मस्त होकर इस दुनिया की सैर करो। तुम्हारा हृदय यह धून गाता चले कि "हे परवरदिगार, तू ही सब कुछ है।"
यह धागा तोड़ दे तसबी,
किताबें डाल पानी में।
मशायख़ बन के क्या करना,
मशीख़त को जलाता जा।।
इस तसबीह का धागा तोड़ दो और ग्रंथो को पानी में डाल दो, यानी रब प्रेम के मार्ग में इनसे कोई भी मदद नहीं मिल सकती। अपने को शेखों की ऊँची जाति का न समझ कर इंसान बनो और इस अभिमान को त्याग दो।
खुदा को दूर मत समझो,
यही रस्ता है मस्तों का।
खुदी को दूर कर दिल से,
इसी के बीच आता जा।।
रब को अपने से दूर मत समझो। यही मस्तों का रास्ता है, जो अंतर्मुखी बनाता है। दिल से मेरेपन की भावना मिटाकर हृदय के बीच अपना मुकाम बनाओ।
कहे 'मंसूर' काज़ी से,
निवाला कुफ्र का मत खा।
अनलहक़ नाम बरह़क है,
यही कलमा सुनाता जा।
मंसूर फकीर काज़ी से कहते हैं कि "तू रब विमुखता का ग्रास मत खा।" अर्थात् रब से विमुख मत हो जाओ। 'मैं रब का ही अंश हूँ' यही संकल्प वाजिब है। इसी को लोगों को समझाओ।

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