सुरदासजी




तुम तजि और कौन पै जाऊँ।
काके द्वार जाइ सिर नाऊँ,
पर हथ कहाँ बिकाऊँ।।
ऐसो को दाता है समरथ,
जाके दिये अघाऊँ।
अंतकाल तुम्हरैं सुमिरन गति,
अनत कहूँ नहिं दाऊँ।।



सब सों ऊँची प्रेम सगाई।
दुर्योधन के मेवा त्यागे,
साग विदुर घर खाई।।

सचमुच प्रेम का रिश्ता सबसे ऊँचा है। वह प्रेम का ही नाता था, जिसके कारण भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के राजमहल में जाकर मेवा खाने से इनकार कर दिया और विदुर के घर में जाकर साग-पात का भोग लगाया।

जूठे फल शबरी के खाये,
बहु विधि स्वाद बताई।
प्रेम के बस नृप सेवा कीन्हीं,
आप बने हरि नाई।।

भगवान राम ने शबरी के झूठे बेरों का न केवल भोग लगाया, बल्कि उनको बहुत ही स्वादिष्ट बताया। प्रेम के वशीभूत होकर भगवान ने अपने भक्त सेन नामक नाई के बदले खुद उसके रुप में जाकर रीवाँ नरेश राजाराम की चरण सेवा की।

राजसुयज्ञ युधिष्ठिर कीन्हों,
ता-में जूठ उठाई।
प्रेम के बस अर्जुन रथ हाँक्यो,
भूल गये ठकुराई।।

युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उन्होंने झूठे पत्तल तक उठाए। प्रेम की जंज़ीर में बंधकर प्रभु ने अर्जुन का रथ हांका। उस समय वे अपनी सारी ठकुराई, मान-सम्मान भूल गये।

ऐसी प्रीत चढ़ी बृन्दावन,
गोपिन नाच नचाई।
'सूर' कूर एहि लायक नाहीं,
कहँ लगि करुँ बड़ाई।।

बृंदावन में तो गोपियों का प्रेम इतना प्रबल था कि उन्होंने भगवान कृष्ण को नाचने पर मजबूर कर दिया। सूरदासजी कहते हैं कि मैं भगवान की लीलाओं का बखान करने योग्य नहीं हूं ! मुझ जैसे अँधे व्यक्ति के लिए यह कायॅ संभव नहीं है।



सुन री मैंने निबॅल के बल राम।।
पिछली साख भरुँ संतन की,
अड़े संवारे काम।।

मैंने सुना है कि निबॅलों के बल भगवान होते हैं। प्राचीन संत भी साक्षी देते हैं कि जो अपने आपको भगवान के भरोसे छोड़ देते हैं, उनके सभी बिगड़े काम प्रभु स्वयं संवार देते हैं।

जब लगि गज बल अपनो बरत्यो,
नैक सरयो नहीं काम।
निर्बल है हरि नाम पुकारयो,
आये आधे नाम।।

एकबार एक गजराज सरोवर में पानी पीने गया तो उसे मगरमच्छ पकड़ कर गहरे पानी में ले जाने लगा। जब तक वह अपना बल लगाता रहा, तब तक उसका संकट नहीं टला। अंत में अशक्त होकर जब उसने अपने आपको भगवान के भरोसे छोड़ दिया तो गजराज द्वारा प्रभु का सुमिरण आरंभ करने पर ही वे उसकी सहायता के लिए दौड़ पडे़, और गजराज का उद्वार कर दिया।

द्रुपद-सुता निबॅल भई जा दिन,
तजि आये निज धाम।
दु:शासन की भुजा थकित भई,
बसन रूप भये श्याम।।

इसी प्रकार कौरवों की सभा में द्रौपदी के चीर हरण के समय जब द्रौपदी ने अपनी लाज बचाने का दायित्व अपने बजाय भगवान के ऊपर छोड़ दिया तब प्रभु तत्काल उसकी सहायता के लिए साड़ी के रूप में प्रकट हो गये। दु:शासन साड़ी खींचते-खींचते थक गया, किंतु द्रौपदी की साड़ी बढ़ती ही गयी, और इस प्रकार भगवान ने उसकी लाज बचा दी।

अपबल तपबल और बाहुबल,
चौथो बल है दाम।
'सूर' किशोर कृपा ते सब बल,
हारे को हरि नाम।।

सूरदासजी कहते हैं कि लोगों को अक्सर अपने बल का, अपनी तपस्या, शरीर और धन या तिकड़म की ताकत का अभिमान रहता है। लेकिन जब तक भगवान की कृपा रहती है तभी तक ये बल भी काम करते हैं। जब मनुष्य अपने सारे प्रयास करके थक जाता है और प्रभु-चरणों में समर्पित हो जाता है, तब प्रभु नाम के बल पर उसके सारे बिगड़े काम बन जाते हैं।



अँखियां हरि दशॅन की प्यासी।।

प्रभु के प्रेम में पगी गोपियां उनके विरह में व्याकुल थीं। जब भगवान कृष्ण ने अपने सखा उध्द्ववजी को गोपियों को सांत्वना देने के लिए भेजा तो उनकी बातें सुनकर गोपियां और भी बेचैन हो गयीं।

देख्यो चाहत कमल नैन को,
निशिदिन रहत उदासी।।

वे कहती हैं कि हमारी आंखें उनके दर्शनों की प्यासी हैं। ये उन कमल के समान नेत्रों वाले प्रभु की रूप सुधा का पान करना चाहती हैं। दर्शनों के अभाव में इन पर हमेशा उदासी छायी रहती है।

आये ऊधो फिर गये अँगना,
डारि गये गल फांसी।
केसर तिलक मोतियन माला,
वृन्दावन कौ बासी।।

उध्द्ववजी आकर हमें शांति कहां से देते, हमें और बेचैन करके चले गये। वे हमारे आंगन में आकर लौट गये और हमारे गले में शुष्क ज्ञान का फंदा डालते गये। निर्गुण, ब्रह्म की महिमा हमारी समझ में नहीं आती। हमें तो उन मानव शरीरधारी कृष्ण जी की भक्ति से वास्ता है जिनके ललाट पर केसर का तिलक, गले में मोतियों की माला शोभा दे रही है और जो इसी बृंदावन के वासी हैं।

काहू के मन की को जानत,
लोगन के मन हाँसी।
'सूरदास' प्रभु तुम्हरे दरश बिन,
लडहों करवत कासी।।

किसी के मन की लगी कोइ क्या जाने ? यदि हमारी बातों की लोग हँसी उड़ाए, तो उससे भी हम पर कोई फर्क पड़नेवाला नहीं है। सूरदासजी कहते हैं कि गोपियों का निश्चय है कि यदि प्रभु के दर्शन नहीं मिले तो वे काशी-करवट लेकर अपनी जान दे देंगी।



भगति बिनु बैल बिराने होइहौ।।

ऐ मन, भक्ति के बिना तुझे दूसरे का बैल होना पड़ेगा।

पाँव चार, सिर सींग,
गूंग मुख, तब गुन कैसे गइहौ।
टूटे कंध, सुफटी नाकनी,
कौ लौं धौं भुस खइहौ ।।

उस समय तेरे चार पांव होंगे और सिर पर सींग हो जाएंगे। मुंह से कुछ बोल पाने की शक्ति जाती रहेगी, तब तुम किस प्रकार प्रभु के गुण गाओगे ? बोझा ढोते-ढोते कंधे फट जायेगें। नथुनों में छेद कर नाथ दिये जाओगे और खाने के लिए रूखा-सूखा भूसा ही मिलेगा।

लादत जोतत लकुटि बाजिहैं,
तब कहँ मूंड़ दुरइहौ।
शीत, घाम, घन बिपत घनेरी,
भार तरे मरि जइहौ।।

बोझ ढोते और खेत जोतते समय डंडों की मार पड़ेगी, तब अपना सिर कहां छिपाओगे ? कड़ाके की ठंड, चिलचिलाती धूप और बारिश का सामना करना पड़ेगा। और इसी प्रकार बोझा ढोते-ढोते एक दिन मर जाओगे।

हरि-दासन को कह्यो न मानत,
कियो आपनो पैहो।
'सूरदास' भगवंत भजन बिनु,
मिथ्या जन्म गंवइहौ।।

इस समय तो भगवद् भक्तों का समझाना नहीं मान रहे हो, लेकिन अपने किये का फल तुम्हें अवश्य भोगना पड़ेगा। सूरदासजी कहते हैं कि भगवान का भजन न करने पर यह मनुष्य जीवन योंही बेकार चला जायेगा।



अपुनपो आपुन ही मैं पायो।।
शब्दहिं शब्द भयो उजियारो,
सतगुरु भेद बतायो।।

अपने ही अन्दर मैंने अपने आपको पा लिया, अपने आपको पहचान लिया। सतगुरु ने ऐसा गृप्त भेद बता दिया कि अपने ही अन्दर स्थित शब्द के अनुभव द्वारा अत:करण में उजियाला हो गया।

ज्यों कुरंग नाभि कस्तूरी,
ढूंढ़त फिरत भुलायो।
जब चेतो जब चेतन ही है,
फिर आपुन तन छायो।।

कस्तूरी मृग की नाभि में ही कस्तूरी होती है, किंतु वह अज्ञानवश उसे बाहर ढूढ़ता है। हमें भी जब गुरु ने चिताया तो सही चेतना मिली और हम अपने आप में ही मग्न हो गये।

राजकुमार कंठमणि भूषण,
भ्रम भयो कहूं गंवायो।
दिया बताय संत जन काहू,
तब तन पाप नसायो।।

जैसे किसी राजकुमार को अपने ही कंठ में पहने हुए हार के खो जाने की भ्रमजनित चिंता उसे बता दिये जाने पर पल भर में दूर हो गयी, वैसे ही गुरु ने ज्ञान देकर मेरे मनुष्य तन का अज्ञान रूपी पाप नष्ट कर दिया।

सपने माहिं नारी को भ्रम भयो,
बालक कहूं हिरायो।
जागि लख्यो ज्यों को त्यों पायो,
फिर कहूं गयो न आयो।।

किसी स्त्री को सपने में भ्रम हो गया कि मेरा बालक कहीं खो गया है, लेकिन जागने पर उसे अपने पास ही पाया। न बालक खोया था, न मिला। वैसे ही मेरे गुरु ने मुझे अज्ञान की नींद से जगा दिया और मैंने अपने आप को पहिचाना। फिर मुझे कहीं आने जाने की जरूरत नहीं रही।

'सूरदास' समुझे की यह गति,
मन ही मन मुसकायो।
कहि न जाइ या सुख की महिमा,
ज्यों गूंगो गुड़ खायो।।

सूरदासजी कहते हैं कि गुरु ने मुझे सत्य की सहज अनुभूति करा दी, जिसका आनंद लेते हुए मैं मन ही मन मुस्काया करता हूं, उसे व्यक्त नहीं कर सकता। ठीक वैसे ही जैसे गूंगा व्यक्ति गुड़ की मिठास के आनंद को कह पाने में असमर्थ होता है। यह समझने और जानने की गति!

Comments

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